मेरे सब पिताओं को प्रनाम !
मेरे पिता (जनक) प्रति..........
जो धरती पर बीज बन गला
जिसकी छाँव तले मैं पला
अंगुली उनकि थी जिसे पकड चला
आज क्यूं भूलुँ उन्हे भला
मेरे पिता (दत्तक) प्रति............
तपती रेत के टीलों पर, चढना उनका
कंधे पर बैठा, भाव न जाना मनका
खुशी के लिये मेरी, छलते जाना उनका
थे तो थाह नहि ढूँढूं क्यूं डूबते हुवे तिनका
मेरे पिता (धर्मपिता) प्रति........
दे कर अपनी दुहिता चाहा जिसने हित मेरा
गर्व किया झूठा तनकर, बाँधे सिरपर सेहरा
पिता बना, खाकर उनकी पोषित लतिका से फेरा
ऋण न चूके, जीवन भर यदि बना रहूं चेरा
मेरे पिता (परमपिता) प्रति.........
तेरे बिना अवलम्ब कहाँ, जो सब दुख हरे मेरे
मिट्टी का खिलोना हूँ, पर डोर हाथ में तेरे
माने ना सत्ता जो तेरी, मिटे रावण से घनेरे
पुत्र सा तूं पाले मुझे ,अहसान मुझपर बहुतेरे
राष्ट्रपिता के साथ उन सभी पिता तुल्यों को प्रणाम .........
रविवार, 13 सितंबर 2009
"क्षमा" मन के माधुर्य का लालीपॉप है और आत्मा के आनन्द का कलाकन्द । उसे देनेवाला भीष्म की तरह धन्य हो जाता है ,तो पाने वाला विदुर की तरह क्रतार्थ । वैसे तो इस धरती पर 'मिट्टी के रंग' हजारों है , लेकिन बेमेल होते हुए भी उनमें आपसी वैसे ही अनमोल रिश्ते है जैसे आपके हमारे रिश्ते। फिर भी इस कलयुग में जाने अनजाने में पिछ्ले इस जीवन रुपी उपन्यास में मेरे द्वारा प्रत्यक्ष -परोक्ष रुप से 'चाणक्य , मंथरा, नारद, कैकयी , रुपी कोई रोल अदा होने के कारण आपके कोमल कर अपनी ही म्रिगनयनी ऑखो के ऑसुओ से भर गये हो , जिससे आपके सर्फ धुले कोमल ह्रदय या हमारे अनमोल रिश्ते मे कोई मालिन्य पैदा हुआ हो तो अपने मशाल रुपी दिव्य ह्रदय का मलिन्य सर्फअल्ट्रा से साफ कर आपसे पुन: क्षमा का सेक्रीन जैसा माधुर्य पाना चाहता हूं । अत: मक्खन रुपी फेविकोल से ह्रदय जोडते हुए - मैत्रीसूत्र आपके हमारे सुद्र्ढ हो प्रेम प्रवाहित हो .................! मन -वचन- काया से क्षमाप्रार्थी (राजाभाई कौशिक)
खण्डित दिल का आश्रय
ध्वस्त जिसको कर दिया है, वक्त के तूफान ने
क्यों उसीका आज तुम, आधार पाना चाहते हो ?
खोगया मझधार में खुद, जो किनारा छोडकर
क्यों उसे माँझी समझ, उस पार जाना चाहते हो ?
यह तुम्हारी भूल है या कि है उन्माद तेरा
जो उस दिवास्वप्न को, साकार पाना चाहते हो ?
व्याधियाँ जिसकी है रातें और व्यथा जिसका सवेरा
क्यों उसी के होठ पर, मधुहास लाना चाहते हो ?
जिन्दगी जिसकी स्वयं टूटी हुई सीतार सी
क्यों उसी सीतार पर तुम स्वर सजाना चाहते हो ?
जो बहारों के मृदुल चरणों से रौंदा गया हो
क्यों उसी की बाँह का मनुहार पाना चाहते हो ?
जल उठेगा बाग भी जिसकी झुलती पाँख से
क्यों एसे फूलको उपवन में लगाना चाहते हो ?
खोगये विश्वास जिसके धूल में एक बूँद जैसे
क्यों उसी का आज तुम विश्वास पाना चाहते हो ?
उजडा हुआ है जो हृदय विधवा की सूंनी माँग सा
क्यों उसी टूटे हृदय का प्यार पाना चाहते हो ?
प्यार ने जिसको छला, मधुमास का आभास देकर
रह गया स्तब्ध सा अब सिर्फ नि:श्वास होकर
दग्ध उर जिसका हुआ है, चिर विरह की आग से
आज फिर उस आग में क्यों घृत चढाना चाहते हो ?
ध्वस्त जिसको कर दिया है, वक्त के तूफान ने
क्यों उसीका आज तुम, आधार पाना चाहते हो ?
खोगया मझधार में खुद, जो किनारा छोडकर
क्यों उसे माँझी समझ, उस पार जाना चाहते हो ?
यह तुम्हारी भूल है या कि है उन्माद तेरा
जो उस दिवास्वप्न को, साकार पाना चाहते हो ?
व्याधियाँ जिसकी है रातें और व्यथा जिसका सवेरा
क्यों उसी के होठ पर, मधुहास लाना चाहते हो ?
जिन्दगी जिसकी स्वयं टूटी हुई सीतार सी
क्यों उसी सीतार पर तुम स्वर सजाना चाहते हो ?
जो बहारों के मृदुल चरणों से रौंदा गया हो
क्यों उसी की बाँह का मनुहार पाना चाहते हो ?
जल उठेगा बाग भी जिसकी झुलती पाँख से
क्यों एसे फूलको उपवन में लगाना चाहते हो ?
खोगये विश्वास जिसके धूल में एक बूँद जैसे
क्यों उसी का आज तुम विश्वास पाना चाहते हो ?
उजडा हुआ है जो हृदय विधवा की सूंनी माँग सा
क्यों उसी टूटे हृदय का प्यार पाना चाहते हो ?
प्यार ने जिसको छला, मधुमास का आभास देकर
रह गया स्तब्ध सा अब सिर्फ नि:श्वास होकर
दग्ध उर जिसका हुआ है, चिर विरह की आग से
आज फिर उस आग में क्यों घृत चढाना चाहते हो ?
तब जाकर कहीं...........एक ले. राजाभाई कौशिक
हवा का बल खाकर चलना, इतराना, उठना
रेत छान लहरें बनाना, खर पतवार को छुपाना।
यूँ ही नही था... उसका बादल लेकर आना
चमकना, गरजना, हरषाना और डराना॥
तपती रेत पर बूँद का, धार का, परनाल का
तल छूने की चाह में गिरना, बह जाना
यूँ ही नही था... उसका उंगलियों के नाप में समा जाना
भीनी भीनी सौंधी सौंधी सुगन्ध और महकना
स्वेद मोतियों के बाने में उजड़े घर का वासी तपता
मुट्ठी से एक एक दाना छोड़ धरती की माँग भरता
यूँ ही नही था... आसमान में टाँगूं ऐसी आशा
थार के एक छोर से चलना, मुड़ना और चलते जाना
फूट कर निकला जो हरित पट पहन
देते हुए आभास लक्ष्य के समीप का
यूँ ही नही था... अंत उस बीज के परिणाम का
उसका बढ़ना, कटना, छिलना और पिसना
कंगनों की खनक बीच, अंजली भर सींच
दोनों हथेलियों की थपथपाहट पाना
यूँ ही नही था... तप्त तवे पर पसर जाना
तब जाकर कहीं एक ... रोटी बनी; और लो ना
हवा का बल खाकर चलना, इतराना, उठना
रेत छान लहरें बनाना, खर पतवार को छुपाना।
यूँ ही नही था... उसका बादल लेकर आना
चमकना, गरजना, हरषाना और डराना॥
तपती रेत पर बूँद का, धार का, परनाल का
तल छूने की चाह में गिरना, बह जाना
यूँ ही नही था... उसका उंगलियों के नाप में समा जाना
भीनी भीनी सौंधी सौंधी सुगन्ध और महकना
स्वेद मोतियों के बाने में उजड़े घर का वासी तपता
मुट्ठी से एक एक दाना छोड़ धरती की माँग भरता
यूँ ही नही था... आसमान में टाँगूं ऐसी आशा
थार के एक छोर से चलना, मुड़ना और चलते जाना
फूट कर निकला जो हरित पट पहन
देते हुए आभास लक्ष्य के समीप का
यूँ ही नही था... अंत उस बीज के परिणाम का
उसका बढ़ना, कटना, छिलना और पिसना
कंगनों की खनक बीच, अंजली भर सींच
दोनों हथेलियों की थपथपाहट पाना
यूँ ही नही था... तप्त तवे पर पसर जाना
तब जाकर कहीं एक ... रोटी बनी; और लो ना
शनिवार, 12 सितंबर 2009
लोहे का स्वाद लुहार से मत पूछो पूछो उस घोडे से
जिसके मुंह मे लगाम हो दिल का दर्द
किसी डाक्टर से मत पूछो
पूछो उस प्रेमी से जो प्रेमिका से जुदा हो इश्क का अर्थ
किसी विचारक से मत पूछो पूछो उस दीवाने से जिसके सीने मे दाग आँखो मे आँसू लबो पर आह हो सोने के भाव
किसी सुनार से मत पूछो
पूछो उस माँ से
जिसका लाल तश्करी मे फाँसी चढा हो कैद की घुटन
किसी कैदी से मत पूछो पूछो उस बछडे से जो अपनी माँ की जांघ से बन्धा हो
जिसके मुंह मे लगाम हो दिल का दर्द
किसी डाक्टर से मत पूछो
पूछो उस प्रेमी से जो प्रेमिका से जुदा हो इश्क का अर्थ
किसी विचारक से मत पूछो पूछो उस दीवाने से जिसके सीने मे दाग आँखो मे आँसू लबो पर आह हो सोने के भाव
किसी सुनार से मत पूछो
पूछो उस माँ से
जिसका लाल तश्करी मे फाँसी चढा हो कैद की घुटन
किसी कैदी से मत पूछो पूछो उस बछडे से जो अपनी माँ की जांघ से बन्धा हो
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